नेशनल रजिस्टर ओफ़ सिटीजनशिप का अंतर्द्वंद

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सत्यम श्रीवास्तव टी एन आई न्यूज़ एजेंसी नई दिल्ली सबसे पहले एनआरसी आसाम में की गई सुप्रीम कोर्ट ने आसाम में एनआरसी कराने का आदेश दिया उस आदेश को आधार बनाकर आसाम में एनआरसी करने का कार्य एक अथॉरिटी बनाकर किया गया लगभग 1700 करोड़ रूपया आसाम की एनआरसी पर खर्च किया गया लगभग 19 लाख लोग इस एनआरसी में अपने भारतीय होने के प्रमाण नहीं दे पाए और उन्हें एनआरसी के तहत विदेशी घोषित कर दिया गया जिनके नाम नेशनल रजिस्टर सिटीजन में नहीं आए उनमें 14 लाख हिंदू एवं 5 लाख मुस्लिम है वहां पर सिटीजनशिप एनआरसी की डेट 1971 रखी गई

1971 में भारत-पाक का युद्ध हुआ था और बांग्लादेश अस्तित्व में आया था इस युद्ध के कारण लाखों बांग्लादेशी नागरिक भारत में शरण लेने आए और भारत सरकार ने उन्हें शरण दी उन्हें खाने पीने सहित सभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई गई धीरे-धीरे वही भारत में शरण लेने वाले लोग काम की तलाश में इधर-उधर नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में खेल गए और वहां छोटा-मोटा काम करके अपना जीवन यापन करने लगे उन्हें राजनीतिक पार्टियों ने वोटर बनाया राशन कार्ड थमाया वोटर आई कार्ड बनाया आधार कार्ड बनाया सब कुछ हमारी सरकारों ने बनाया इतना ही नहीं उनके बाल बच्चे भी इन्हीं पूर्वोत्तर के राज्यों में पैदा हुए वहीं पर उन्होंने शिक्षा दीक्षा पायी।

आज तक भारत में शरण के लिए आए इन बांग्लादेशी नागरिकों को कभी वापस भेजने का प्रयास नहीं किया गया अब वह भारतीय सुविधाएं पाकर यहीं पर वोट बैंक बन गए और यहां राज्य सरकारें एवं भारत सरकार का चुनाव मताधिकार से करने लगे धीरे धीरे स्थानीय लोगों में सुख सुविधाओं को लेकर उनके खिलाफ आक्रोश बढ़ने लगा और इन्हें आसाम से निकालने की मांग उठने लगी इसी तरह की मांग पूर्वोत्तर के कई राज्यों में समय-समय पर उठती रही है इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों में बिहार उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश सहित राजस्थान के लोग भी सन 1971 के पहले के वासी है यह लोग भी यहां काम की तलाश में आए थे उस समय पहचान पत्र के रूप में ना तो वोटर आई कार्ड होता था ना पैन कार्ड होता था ना जन्म प्रमाण पत्र होता था और जो मजदूरी का काम करते थे वह इतने पढ़े लिखे भी नहीं थे यानी कि उनके पास कोई शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण पत्र भी नहीं था वह छोटी मोटी मजदूरी रेडी एवं राजमिस्त्री का काम करके अपना जीवन यापन करते थे वह जहां से पलायन करके आए थे.

यह लोग भोजपुरी भाषा बोलते थे धीरे-धीरे उन्होंने पूर्वोत्तर की भाषा सीखी और उन्हें पूर्वोत्तर वासियों में समा गए आज इनके पास ना पूर्वोत्तर राज्य का कोई प्रमाण पत्र है ना जहां इनका जन्म हुआ था वहां का कोई दस्तावेजी सबूत, इन्हीं सब कागजातो के अभाव में यह राष्ट्रीय नागरिक सिटीजन रजिस्टर का हिस्सा नहीं बन पाए और इन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया बाद में इस एनआरसी को खारिज कर दिया गया अब भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने सारे भारत में एनआरसी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप कराने की घोषणा की है जब यह एनआरसी आसाम में ही सफल नहीं हो पाई तो फिर पूरे भारत में सफल कैसे होगी यह सबसे बड़ा चिंता का विषय है

आज भी करोड़ों आदिवासियों के पास कोई जन्म प्रमाण पत्र नहीं है वह अपने बच्चे का जन्म अस्पताल में ना करा कर घर पर ही जंगलों में करवाते हैं यानी कि उनके बच्चों का जन्म उनके झोपड़ी नुमा घर में ही होता है दाई या घर की कोई बुजुर्ग महिला बच्चे के जन्म के समय सहायक का काम करती है फिर उसका जन्म प्रमाण पत्र कहां से आएगा जातक बच्चे पढ़ाई नहीं करते करते भी हैं तो 5 क्लास तक पढ़ाई करते हैं स्कूल में जिस रजिस्टर में बच्चे का नाम होता है उसे स्कूल का मास्टर दो चार साल बाद रद्दी में बेच देता है फिर पढ़ने वाले बच्चे का रिकॉर्ड कहां से आएगा यानी कि यह प्रमाण वह कहां से लाएगा कि बच्चा भारतीय है इसी तरह अधिकांश आदिवासी कभी कोर्ट कचहरी या पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ते तो उनका पुलिस रिकॉर्ड भी नहीं होता मुकदमा बाजी आदिवासी करते नहीं है कोर्ट कचहरी के या शहर के उन्होंने कभी दर्शन तक नहीं किए फिर उनके पास यह प्रमाण पत्र कहां से आएगा कि वह भारतवासी हैं जब बच्चे का जन्म होता है तो वह परिवार में होता है सबसे पहले बच्चा अपने माता पिता और परिवार के लोगों को पहचानता है उसके बाद वह अपनी जाति समाज और पड़ोसियों को पहचानता है जब बच्चा लगभग 12 से 14 वर्ष का हो जाता है तब कहीं उसे अपने जिले अपनी तहसील अपने ब्लॉक और अपने प्रदेश तथा राष्ट्र के बारे में जानकारी होती है यानी कि वह 14 वर्ष की उम्र में अपने देश को पहचान पाता है कि मैं भारत वासी हूं मेरा देश भारत है !

अब इसमें भी पंगा है कहीं देश को भारत कहते हैं कहीं हिंदुस्तान कौन सा माना जाए इतना ही नहीं इंग्लिश में इसे इंडिया कहते हैं करेंसी पर यह इंडिया है स्टांप पेपर पर भारत है और भारतीय बोलचाल की भाषा में यह हिंदुस्तान है जिस देश के कई नाम हो सरकारी दस्तावेजों में भी अलग-अलग नाम है हमसे उस देश के आप नागरिक हैं या नहीं प्रमाण पूछा जा रहा है पूछ कौन रहा है जो हमसे वोट लेकर सांसद बने प्रधानमंत्री बने मंत्री बने वही लोग हमसे पूछ रहे हैं क्या आप भारत के नागरिक हैं प्रमाणित करो अरे मूर्खों अगर हम भारत के नागरिक नहीं है तो फिर हमारा वोट अवैध था और जिनको हमने चुना वह वैध कैसे हो सकते हैं अगर हम गलत है तो हमने जिसे चुना है वह सही कैसे हो गया अगर हम अवैध नागरिक हैं तो भारत सरकार भी अवैध है प्रधानमंत्री भी अवैध है पूरी संसद अवैध है उनके द्वारा की गई नियुक्तियां चाहे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हो या मुख्य चुनाव आयुक्त या रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर सब अवैध है एनआरसी बिल संसद में लाकर हमसे प्रमाण मांगने वाले पहले आसाम में उस चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करें जिस सरकार ने अपने चुनावों में उन 19 लाख लोगों का वोट लिया था जिन्हें अब विदेशी नागरिक बताया जा रहा है आसाम सरकार को चुनने में उन 19 लाख लोगों की सहभागिता भी थी जो एनआरसी के तहत विदेशी मान लिए गए थे।

संसद में राष्ट्रीय रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप का प्रस्ताव तो पास करके कानून बनाइए लेकर उसने यह पैराग्राफ भी जोड़ दीजिए अगर यह अवैध घोषित किए गए तो इनके द्वारा चुनी हुई भारत सरकार भी अवैध मानी जाएगी और उस सरकार को चलाने वाले प्रधानमंत्री सहित सभी मंत्रिमंडल के सदस्यों व इस को कानून बनाने वाले संसद सदस्यों को भी वहीं सजा मिलेगी जो सजा दस्तावेजों के अभाव में नागरिकों को मिलने वाली है क्योंकि यह सरकार भी उन्हें दस्तावेज के बिना भारतीय नागरिक ना होने वाले लोगों द्वारा चुनी गई सरकार है यह भी अपने आप को भारतीय सरकार होने का दावा कैसे कर सकती है

भारत के सभी राज्यों की यही कहानी है यहां हर तीसरा व्यक्ति दूसरे राज्यों से आया हुआ है वह काम की तलाश में यहाँ आया था उसके पुरखे रोजगार की तलाश में यहां आए थे यहीं पर उन्होंने खाया कमाया यही मकान बनाए यही उनके बच्चे पैदा हुए अब उनसे यह प्रमाण पूछा जा रहा है तुम यहां के हो तुम्हारे पास इस बात का क्या प्रमाण है बताइए वह प्रमाण कहां से लाएगा।

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